अपने दूसरे कार्यकाल में कितना बदल गए हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ?

न्यूज पैंट्री डेस्क : आम तौर पर कोई नेता जब लगातार दूसरी बार चुनाव जीतकर आता है तो उसका पहला साल जोश दिखाने का होता है. वैसे भी लोकतंत्र में चुनाव जीतकर आने वाला नेता नए विचारों और नए समर्थन से लैस होता है. संसदीय चुनावों में नरेंद्र मोदी की भारी जीत कुछ लोगों के लिए उनके भरोसे की पुष्टि थी तो कुछ लोग अपने आकलन की टांय-टांय फिस्स होते देखते रहे.

यह बात अब पूरी तरह साफ हो चुकी है कि 2019 में बीजेपी की शानदार जीत ने कमजोर विपक्ष को और लाचार बना दिया. ऐसे में सत्ताधारी पार्टी की राह एकदम आसान हो गई. मोदी सरकार ने इस स्थिति का फायदा उन वादों को पूरा करने के लिए उठाया जिसकी बात वह काफी सालों से करती रही थी.

विपक्ष हमेशा से कहता रहता था कि बीजेपी कभी अपने इन वादों को पूरा नहीं कर पाएगी. इनमें राम मंदिर, तीन तलाक और जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म करने जैसे वादे शामिल हैं. मोदी सरकार ने न सिर्फ इन मुद्दों पर साहसिक फैसला लिए बल्कि उन्हें लागू कराने में प्रशासनिक स्तर पर भी मजबूत रणनीति अपनाई.

अच्छे दिन से आत्मनिर्भर भारत तक का सफर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल का एक साल पूरा कर लिया है. उनके नेतृत्व में सरकार ने कई बड़े और ऐतिहासिक फैसले लिए. साथ ही कई मुद्दों पर सरकार बुरी तरह फंसती नजर आई. अनुच्छेद 370 में बदलाव, सीएए-एनआरसी और तीन तलाक जैसे मामलों में पीएम मोदी फ्रंट फुट पर नजर आए. अब कोरोना जैसी घातक महामारी से निपटना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है.

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भाजपा सरकार ने अपने पहले साल में ऐसे कदम उठाए, जिनकी न तो विपक्षी दल उम्मीद कर रहे थे और न ही देश के आम लोग. सरकार ने हर फैसले के साथ लोगों को पूरी तरह चौंका दिया. प्रधानमंत्री मोदी ने न तो पहल करने में कोई भय दिखाया और न ही पहल के नाकामयाब होने पर उससे पल्ला झाड़ने में. पिछले कार्यकाल में अच्छे दिन का नारा देने वाले पीएम मोदी अब आत्मनिर्भर भारत का स्लोगन देते नजर आ रहे हैं. यह सफर उनकी कामयाबी और नाकामी, दोनों का ही सफर है.

चौंकाने वाले फैसले और विरोध का साल

2014 में विकास और रोजगार के नाम पर भारी बहुमत से चुनकर आए पीएम मोदी को पहले कार्यकाल में भरपूर अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिला. लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल में मोदी ने विदेश नीति से ज्यादा घरेलू नीति पर ध्यान दिया है. यह कार्यकाल असम में नागरिकता रजिस्टर, नागरिकता कानून में संशोधन और जम्मू और कश्मीर के पुनर्गठन के फैसले के रूप में सामने आया.

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असम में अवैध प्रवासियों के लिए डिटेंशन कैंप बनाने को लेकर विवाद बना रहा और तीन तलाक कानून को लेकर सरकार को मुस्लिम धड़े का विरोध झेलना पड़ा. इसके बाद जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों में संसोधन किया गया और राज्य का दर्जा घटाकर केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया. घाटी में महीनों तक पूरी तरह कर्फ्यू और पूर्व मुख्य मंत्रियों सहित सैकड़ों नेताओं की गिरफ्तारी को लेकर काफी विवाद हुआ. मोदी सरकार को धार्मिक आधार पर बनाए गए नए नागरिकता कानून के लिए सबसे अधिक विरोध झेलना पड़ा. इम मुद्दे पर ऐसा ध्रुवीकरण हुआ कि राजधानी दिल्ली में दंगे भड़क उठे.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पीएम मोदी की साख 

अगर मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले साल को तीन हिस्सों में बांटा जाए, तो पहले हिस्से में साहसिक राजनीतिक फैसले किए गए. दूसरा हिस्सा पूरी तरह विरोध का रहा और तीसरे हिस्से में कोरोना महामारी को रोकने की अप्रत्याशित चुनौती मुंह बाए खड़ी है. उनके दूसरे कार्यकाल में अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने जम्मू कश्मीर और नागरिकता संशोधन जैसे कानूनों पर चुप्पी साधे रखी है. जानकारों का कहना है कि वह समर्थन से ज्यादा भारत को नाराज न करने की रणनीति है.

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भारत का विशाल बाजार दुनिया के बड़े देशों को लुभाता है. वहीं पश्चिमी देश भारत को एशिया प्रशांत क्षेत्र में चीन के विकल्प के रूप में देखते हैं. इस समय कोरोना महामारी को लेकर चीन की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं तो कई देश निवेश के लिए भारत को वैकल्पिक ठिकाने के रूप में देख रहे हैं.

पीएम मोदी को बदलनी होगी अपनी रणनीति

मोदी सरकार के तेज और सही समय पर लिए गए फैसलों की वजह से भारत कोरोना महामारी को रोकने में अब तक सफल रहा है. इस जानलेवा वायरस पर काबू पाने के लिए लॉकडाउन सही समय पर किया गया लेकिन जिस तरह से इसे लागू किया गया उसने सरकार और समाज की कमजोरियों को सामने ला दिया. लाखों मजदूर पैदल ही घर जाते दिखे और सरकार इस मुद्दे पर पूरी तरह नाकाम दिखी.

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मोदी सरकार 2.0 के एक साल बाद प्रधानमंत्री के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं. उन्हें घरेलू मोर्चे पर प्रवासी मजदूरों की समस्या हल करनी है. मोदी सरकार पर समाज को बांटने के आरोप लगते रहे हैं इसलिए इस पर भी प्रधानमंत्री को सोचना होगा. देश के नेता के तौर पर ये जिम्मेदारी उन्हीं की बनती है कि वे राजनीतिक नफा नुकसान को परे रखकर सबको साथ लेकर चलें.


कोरोना संकट हमारे सामने कुछ सच्चाइयां और कमजोरियां लेकर आया है. डिजिटल युग की नई और अच्छी कमाई वाली नौकरियां पैदा करना सरकार की प्रमुख चुनौती होगी. अर्थव्यवस्था पक्की होगी तो पड़ोसियों का बर्ताव भी बदलेगा. इस समय पाकिस्तान हो, चीन या नेपाल, सब आंखें दिखा रहे हैं. आर्थिक मजबूती में दूसरे भी हिस्सा चाहते हैं, वे लड़ना नहीं चाहते.

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