लोगों को आखिर कब तक रखनी होगी सोशल डिस्टेंसिंग ?

न्यूज पैंट्री डेस्क : कोरोना वायरस सारी दुनिया के लिए एकदम नया है. ये कहां से आया है?, कैसे रुकेगा? इसका इलाज क्या है? अभी किसी को कुछ नहीं पता. लेकिन एक बात सौ फीसद सही साबित हो गई है कि इसे सोशल डिस्टेंसिंग से रोका जा सकता है. जिन देशों ने भी इस पर क़ाबू पाया, वहां यही हथियार अपनाया गया है.

भारत में भी सोशल डिस्टेंसिंग करने को कहा जा रहा है. और इसीलिए सरकार को लॉकडाउन करना पड़ा. लेकिन ये सोशल डिस्टेंसिंग आख़िर कब तक चलेगी? लगभग सभी देश लोगों को घरों में रहने, लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की सलाह दे रहे हैं. इसका मक़सद सिर्फ़ और सिर्फ़ लोगों को संक्रमित लोगों के संपर्क में आने से रोकना है. सेल्फ़ आइसोलेशन और क्वारंटीन सोशल डिस्टेंसिंग के ही अलग-अलग रूप हैं.

सोशल डिस्टेंसिंग का ये दौर अभी थोड़े और समय तक चलने वाला है. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ अमरीका में सोशल डिस्टेंसिंग का ये अमल 2022 तक जारी रह सकता है. हालांकि ये रिपोर्ट अभी किसी शैक्षिक पत्रिका में छपनी बाक़ी है. उम्मीद है कि 2022 तक कोविड-19 की वैक्सीन और दवा खोज ली जाएगी.

लेकिन तब तक सोशल डिस्टेंसिंग और क्वारंटीन का पालन करना होगा. अगर मौसम के चक्र का इस वायरस पर कुछ असर होता है, तो संभव है कि साल के अंत में ये वायरस फिर से सक्रिय हो जाए. कोविड-19 से संक्रमित व्यक्ति औसतन 2 से 3 व्यक्तियों को संक्रमित करता है.

कोविड-19 पर चीन में हुई एक रिसर्च के मुताबिक़ इस वायरस के लक्षण 5 दिन में ही शरीर में फैलने लगते हैं और 14 दिन में साफ़ तौर पर नज़र आते हैं. इस बीच अगर कोरोना संक्रमित सामान्य इंसान की तरह लोगों से मिलता जुलता रहता है, तो वो 2 से 3 लोगों को संक्रमित करता है.

और फिर यही 2 से 3 लोग आगे इतने ही लोगों को संक्रमित करते हैं और कोरोना के फैलने का दायरा बढ़ता चला जाता है. इस तरह एक कोरोना संक्रमित एक महीने में लगभग 244 लोगों को संक्रमित बना देता है. अगर रोकथाम न की गई, तो अगले दो महीने में यही आंकड़ा 59 हज़ार 604 तक पहुंच सकता है.

ये वायरस ऐसे लोगों से भी फैलता है, जो संक्रमित हो चुके हैं लेकिन उनमें कोई लक्षण नज़र नहीं आता. इसे साइलेंट ट्रांसमिशन कहते हैं. लगभग 10 फ़ीसद केस में ऐसा साइलेंट ट्रांसमिशन नज़र आता है. ऐसे लोग अगर ख़ुद अपने को लोगों से दूर कर लें, तो बहुत हद तक कोविड-19 को फैलने से रोका जा सकता है.

मतलब एक कोरोना संक्रमित सिर्फ एक व्यक्ति को ही संक्रमित कर सकता था. सोशल डिस्टेंसिंग का एक और मक़सद इसकी रफ़्तार को कम करना है. यानी अगर ये लोगों तक पहुंचने में समय ज़्यादा लेगा तो इसकी ताक़त कम हो जाएगी. ये कम से कम लोगों को ही नुक़सान पहुंचाएगा.

अगर लोग एक दूसरे के क़रीब आते रहेंगे तो वायरस के प्रकोप फैलता जाएगा. कोविड-19 के फैलने में समाज के ताने-बाने और लोगों की उम्र का भी बड़ा हाथ है. मिसाल के लिए इटली में ज़्यादातर संयुक्त परिवार हैं और यहां बुज़ुर्गों की तादाद भी ज़्यादा है.

लोग एक दूसरे के नज़दीक रहते हैं. इसीलिए यहां कोविड-19 से सबसे ज़्यादा मौत भी हुई हैं. इटली में जितने लोग संक्रमण की वजह से मरे हैं, उनमें बड़ी संख्या बुज़ुर्गों की है. फिर भी इटली में जहां भी सोशल डिस्टेंसिंग का फ़ॉर्मूला अपनाया गया, वहां संक्रमण की रफ़्तार काफ़ी कम हुई है.

उस वक़्त वायरस फिर तेज़ी से फैलने लगता है. इसलिए वायरस को कमज़ोर करने के लिए लंबे समय तक सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना ज़रुरी है. ज़ाहिर है सोशल डिस्टेंसिंग का सख़्ती से पालन करना इतना आसान नहीं. हर किसी की ज़िंदगी में ऐसे मौक़े आते ही हैं जब लोग इकट्ठा होते हैं.

वैसे जानकार ख़ुद भी इस बात को मानते हैं कि ज़्यादा वक़्त तक एक दूसरे से दूर रहने पर ह्रदय रोग, तनाव और पागलपन का शिकार होने की संभावना बढ़ जाती है. आज हम 1918 के दौर में नहीं हैं जहां सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना मुश्किल हो.

आज हम तकनीक के सुनहरे दौर में हैं, जहां तकनीक के ज़रिए हम एक ही वक़्त में सारी दुनिया से जुड़ सकते हैं. अगर कोरोना को हराना है और स्वस्थ रहना है, तो एक लंबे वक़्त के लिए सोशल डिस्टेंसिंग बनाना ज़रूरी है.

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