देश में गरीबी खत्म करने के लिए RBI ज्यादा नोट क्यों नहीं छापता, वजह जान लीजिए

न्यूज पैंट्री डेस्क : कभी-कभी आपके मन में ख्याल आता होगा कि जब रिजर्व बैंक के पास नोट छापने की मशीन है तो फिर वो ज्यादा नोट क्यों नहीं छापता. एक ही बार में इतने नोट छाप दो कि देश की गरीबी समाप्त हो जाए. सरकार भी कहती रहती है कि उसके पास पैसा नहीं है, तो आरबीआई से नोट क्यों नहीं छपवा लेती?
अब ताजा हालात को ही ले लीजिए. देश की अर्थव्यवस्था संकट में है. लोगों की रोजी-रोटी छिन गई है. खाने तक के लाले पड़ गए हैं. मजदूर पैदल ही अपने घर जा रहे हैं. ऐसे में सरकार उन्हें नए नोट छपवाकर क्यों नहीं दे देती? ऐसे सवाल आम तौर पर सबके दिमाग में आते रहते हैं. सरकार के मन में भी यही ख्याल आता होगा. फिर समस्या क्या है? आइए नोट छापने के इस गणित को समझ लेते हैं.

आरबीआई के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन ने अभी हाल ही में सरकार से कहा कि कोरोना और लॉकडाउन से जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई के लिए रिजर्व बैंक को नए नोट छापने चाहिए. रिजर्व बैंक ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. अब समझ लेते हैं कि आरबीआई बेहिसाब नोट क्यों नहीं छापता?
असल में ज्यादा नोट छापने से कुछ बड़ी समस्याएं सामने आती हैं. इसी वजह से सिर्फ आरबीआई ही नहीं बल्कि दुनिया की सभी केंद्रीय बैंक ज्यादा करेंसी छापने से बचती हैं. कुछ देशों ने ऐसा करने की कोशिश की लेकिन उन्हें इसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा.

यह कैसे तय होता है कि कितने नोट छापने हैं ?

हर साल आरबीआई नए नोट छापता है और उन्हें देश भर में सर्कुलेट कर देता है. नए नोट छापने से पहले ये देखा जाता है कि फिलहाल कितने नोट सर्कुलेशन में हैं? साथ ही अर्थव्यवस्था और राजकोषीय घाटे जैसे कई फैक्टरों पर विचार किया जाता है. इन सब का गणित देखने के बाद तय किया जाता है कि कितने नए नोट छापे जाने चाहिए.
अब मान लीजिए कि आरबीआई अपनी मर्जी से ज्यादा नोट छाप दे तो क्या होगा? अर्थव्यवस्था के जानकार कहते हैं कि ऐसा करने से बेतहाशा मंहगाई बढ़ जाएगी. जब लोगों के हाथ में ज्यादा पैसे आएंगे तो वे जमकर खर्च करेंगे. इसका मतलब हुआ कि वे अपनी मौजूदा क्षमता से ज्यादा चीजें खरीदना शुरू कर देंगे. उनकी अपेक्षाएं बढ़ जाएंगी.

ज्यादा नोट छापने में दिक्कत क्या है ?

इसका नतीजा क्या होगा? बाजार में अचानक चीजों की डिमांड बढ़ जाएगी और मंहगाई 107 वें आसमान पर पहुंच जाएगी. जब लोगों के पास ज्यादा पैसे होंगे तो वो करोड़पति तो बन जाएंगे लेकिन उस वक्त बाजार में करोड़ रुपये की भी वही हैसियत होगी जो इस वक्त मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों की होती है.
जब बाजार में करोड़ों रुपये की वेल्यू कम हो जाएगी तो लोग अमीर नहीं रह जाएंगे. शेयर बाजार टूट जाएगा. इसके बाद आपको 1 लीटर दूध, ब्रेड, प्याज, टमाटर जैसी चीजें खरीदने के लिए हजारों-लाखों रुपये खर्च करने पड़ जाएंगे.

किन देशों ने प्रयोग किया ?

कई देशों ने ज्यादा नोट छापकर देख लिए हैं. उसके बाद वहां के हालात इतने बिगड़े कि रातों-रात देश दिवालिया हो गया. जिम्बाबवे और वेनेजुएला ऐसा कर चुके हैं. वेनेजुएला तो अभी तक बुरे हालातों का सामना कर रहा है. दरअसल, वहां अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए सरकार ने भारी संख्या में नोटों की छपाई शुरू करा दी.
हालात ये हो गए कि 1 करोड़ और 1 खरब का नोट भी छापा गया. इसके बाद जो सुनामी आई उसने वेनेजुएला के नागरिकों को दाने-दाने के लिए मोहताज कर दिया. साल 2018 में वहां 10,20 या 50 नहीं बल्कि 18 लाख फीसदी तक मंहगाई बढ़ गई. लोग भूख से तड़पने लगे. बाजार में सामान नहीं मिल रहा था. दूध और अंडे जैसी चीजें खरीदने के लिए लाखों रुपये खर्च करने पड़ रहे थे.

ज्यादा नोट छापना मतलब खतरा मोल लेना

आर्थिक मामलों के जानकार इस मसले पर अपनी राय देते हैं. उनका कहना था कि असीमित नोट छापने के कारण वहां की मुद्रा की वैल्यू डॉलर के मुकाबले गिर गई. दुनिया भर में व्यापार के लिए डॉलर का ही इस्तेमाल होता है. ऐसे में वेनेजुएला की मुद्रा सिर्फ कागज बनकर रह गई. वहां के 25 लाख बोलिवर की वैल्यू एक डॉलर के बराबर हो गई.
आलम ये हो गया कि लोगों ने नोटों को कूड़े में रद्दी की तरह फेंकना शुरू कर दिया. कुछ ऐसा ही जिम्बाबवे में भी हुआ. साल 2008 में वहां ज्यादा नोट छापने की वजह से 79.6 फीसदी तक मंहगाई बढ़ गई. इन उदाहरणों से आप समझ गए होंगे कि नोट छापने का गणित क्या है और क्यों आरबीआई ज्यादा नोट छापने से बचती है.
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