दानिश का ब्लॉग : ‘लत ऐसी लगी है कि तेरा नशा मुझसे छोड़ा नहीं जाता’

दानिश आलम, न्यूज पैंट्री/दिल्ली : पूरी दुनिया इस वक्त कोरोना महामारी से परेशान है. सभी मुल्क अपने-अपने स्तर पर इससे निपटने की कोशिश कर रहे हैं. दुनिया भर के वैज्ञानिक और शोधकर्ता इसकी वैक्सीन बनाने में जुटे हैं, मगर हिंदुस्तान अपनी ही रौ में है. ऐसा नहीं है कि यहां वैक्सीन पर काम नहीं हो रहा है या फिर कोविड-19 महामारी को हराने की रणनीति नहीं बनाई जा रही है.

मुल्क में जरूरत के मुताबिक सभी कदम उठाए जा रहे हैं लेकिन 130 करोड़ की अवाम वाले इस देश में मौजों की कोई कमी नहीं है. खबरची जहरखुरानी कर रहा है. हुकूमत में बैठे लोग और विपक्षी खेमा राजनीति करने से बाज नहीं आ रहा है. नौजवानों का एक बड़ा तबका यूट्यूब बनाम टिकटॉक की कैट फाइट का लुत्फ उठा रहा है.

सड़कों पर रेंगता समाजवाद

इन सारे मौज-मस्ती के बीच लाखों मजदूर देश के बड़े-बड़े राजमार्गों पर चिलचिलाती धूप में अपने बच्चों के साथ पैदल सफर कर रहे हैं. यह सिर्फ लाखों की भीड़ का पैदल चलना नहीं है बल्कि एक समाज और एक देश के रूप में हमारी नाकामी का अंजाम है. अजीब विंडबना है कि जहां एक तरफ भारत का समाजवाद सड़कों और पटरियों पर रेंगता दिखाई दे रहा है वहीं दूसरी ओर पूंजीवाद वातानुकूलित भवनों में मस्त है.

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कोरोना के बहाने प्रवासी मजदूरों के पलायन से एक बात तो साफ हो गई कि समाज में जाति, धर्म, समुदाय, नस्ल, रंग अथवा लिंग भेद का विभाजन काफी छोटा विभाजन है. दरअसल समाज का सबसे बड़ा और डरावना बंटवारा तो अमीरी और गरीबी के बीच है.

सरकारी उदासीनता की मौत मरते श्रमिक

मजदूरों पर इतना सितम क्या कम था कि सरकारों ने श्रम कानूनों में मनमाना बदलाव कर दिया. इन बदलावों से मजदूरों को मिलने वाले तमाम जरूरी अधिकार एक झटके में खत्म कर दिए गए. सनद रहे कि चुनाव दर चुनाव सभी राजनीतिक दल इन्हीं मजदूरों और श्रमिकों की बेहतरी का सब्जबाग दिखाकर वोट मांगते रहे हैं.

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हैरत की बात है कि देश का ताना-बाना इतना बिगड़ने के बावजूद हम होश के नाखून नहीं ले रहे हैं. इसके बजाय हम अपने आदतों के मुताबिक स्याह खामोशी और सालभर चलने वाली मौज मस्ती में मगन हैं. हम जहनी तौर पर अपनी आदतों के गुलाम हो गए हैं. फिर भी कहते हैं, “लत ऐसी लगी है कि तेरा नशा मुझसे छोड़ा नहीं जाता”. जबाव में हकीम कहता है, “इक बूंद भी इश्क अब जानलेवा है.”

मजदूर अपनी गरीबी और पलायन के लिए मजबूर हैं और ऊंचे मकानें वाले हिंदुस्तानी अपनी मौज-मस्ती के सामने लाचार हैं. दोनों का सिलसिला यूं ही चलता रहता है.

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