कोरोना और लॉकडाउन के बीच ‘पारले जी’ की कैसे हुई बल्ले-बल्ले !

न्यूज पैंट्री डेस्क : कोरोना महामारी के कारण भारत में लंबी अवधि का लॉकडाउन लागू है. इसकी वजह से लाखों लोगों को रोजगार छिन गया. शहर से लेकर गांव तक लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया. महामारी से ज्यादा लोगों को आर्थिक तंगी से ज्यादा हलकान होना पड़ा है. तमाम कंपनियां घाटे में चल रही हैं और उनकी स्थिति खराब होती जा रही है. 

इन तमाम बुरी खबरों के बीच पारले-जी को गुड न्यूज मिली है. पिछले साल चर्चा चल रही थी आर्थिक तंगी के कारण पारले जी कंपनी बड़े घाटे का सामना कर रही है. भारी नुकसान को देखते हुए कंपनी के सामने कर्मचारियों की छंटनी करने की नौबत आ गई थी. इत्तेफाक की बात देखिए कि यह पांच रुपये वाला बिस्किट कोरोना संकट के दौर में खूब सुर्खियां बटोर रहा है.

पारले जी का गोल्डन लॉकडाउन

पारले जी बिस्किट बनाने वाली कंपनी ने कहा है कि लॉकडाउन के दौरान इतने बिस्किट बिके जितने पिछले चालीस साल में भी नहीं बिके थे. इसका मतलब हुआ कि दूसरे लोगों के लिए लॉकडाउन की वजह से भले ही कितना ही नुकसान हुआ हो लेकिन पारले जी वाली कंपनी को जबर्दस्त मुनाफा हुआ है.

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पारले-जी बनाने वाली कंपनी पारले प्रोडक्ट्स के एक सीनियर अधिकारी मयंक शाह ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बात की. उन्होंने कहा, “लॉकडाउन के दौरान बिस्किट की बिक्री में जबर्दस्त वृद्धि हुई है. यह इतनी ज्यादा थी कि पिछले 30-40 सालों में इतनी बढ़ोत्तरी कभी नहीं हुई.” मंयक ने कहा कि बाजार में बिस्किट कंपनियों के बीच कड़ी प्रतियोगिता है. पिछले दो महीनों में पारले जी ने बाजार की 5% हिस्सेदारी पर कब्जा कर लिया है.

पारले जी के लिए आपदा बनी अवसर

लॉकडाउन में तकरीबन सभी कंपनियां मुश्किलों का सामना कर रही थीं तो फिर पारले जी को इतना मुनाफा कैसे हो गया? इस सवाल के जवाब में जानकार दो वजह बताते हैं. पहली ये कि कोरोना महामारी के दौर में आम लोगों ने पारले बिस्किट का स्टॉक जमा कर लिया. दूसरी ये लॉकडाउन के दौरान गरीब और जरूरतमंदों के लिए सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं ने खाने के जो पैकेट बांटे, उनमें पारले-जी बिस्किट को भी शामिल किया.

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कंपनी का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब कोई आपदा कंपनी के लिए अवसर बनकर आई हो. इससे पहले भी जब देश के किसी हिस्से में कोई प्राकृतिक आपदा, जैसे सुनामी या भूकंप आते थे, पारले जी बिस्किट की बिक्री काफी बढ़ जाती थी. जानकारों की मानें तो लॉकडाउन के दौरान लोग घरों में बंद हो गए थे. खाने-पीने के लिए उन्होंने ब्रेड और बिस्किट जैसी चीजों की जमकर खरीद की. इसका मतलब हुआ कि बाजार में सभी तरह के बिस्किटों की बिक्री बढ़ी है लेकिन सस्ता होने की वजह से लोगों ने पारले जी को ज्यादा पसंद किया.

पारले जी कंपनी का इतिहास

मोहनलाल दयाल ने साल 1929 में पारले कंपनी की स्थापना की थी. मुंबई के विले पारले इलाके में शुरू हुई इस कंपनी में महज 12 लोगों के साथ काम चालू हुआ था. विले पारले के नाम पर ही कंपनी का नाम भी पारले रखा गया. शुरूआती दिनों में कंपनी चॉकलेट (कैंडीज़) और पेपरमिंट बनाया करती थी. फिर आया साल 1938. इसी साल कंपनी ने पहली बार बिस्किट बनाया और उसका नाम रखा पारले-ग्लूको.

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80 का दशक आते-आते इसका नाम बदलकर पारले-जी कर दिया गया. इसके बाद कंपनी ने कई और प्रोडक्ट भी बनाए. देखते ही देखते पारले जी का नाम और स्वाद लोगों की जुबां पर छा गया. जिस विले पारले इलाके में पहली फैक्ट्री लगाई गई थी वो साल 2016 में बंद हो गई. इस वक्त कंपनी की 10 फैक्ट्रियां हैं.

125 अन्य सहयोगी कारखानों में भी कंपनी अपने प्रोडक्ट्स तैयार कराती है. पारले कंपनी में करीब एक लाख लोग काम करते हैं. कंपनी हर साल 10 हजार करोड़ की बिक्री करती है. एक अनुमान के मुताबिक दुनिया के 100 देशों में हर सेकेंड पारले-जी के 4,500 बिस्किट खाए जाते हैं.

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